सहारनपुर। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के पठेड़ गांव स्थित आयशा मस्जिद में पांच वक्त की अजान को लेकर चल रहा करीब तीन महीने पुराना विवाद अब इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देश के बाद नए मोड़ पर पहुंच गया है। ध्वनि प्रदूषण की शिकायत के बाद पुलिस की ओर से मस्जिद में लाउडस्पीकर के जरिए अजान को लेकर रोक लगाए जाने का मामला जुलाई 2026 में हाईकोर्ट पहुंचा था। अब अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि याचिकाकर्ता ध्वनि प्रदूषण से जुड़े निर्धारित नियमों और अदालत के पूर्व निर्देशों का पालन करते हैं, तो पुलिस और जिला प्रशासन पांच वक्त की अजान में हस्तक्षेप नहीं करेगा।
हालांकि, हाईकोर्ट के आदेश को लाउडस्पीकर के इस्तेमाल की बिना शर्त अनुमति के तौर पर नहीं देखा जा सकता। अदालत ने साफ किया है कि अजान और ध्वनि-विस्तारक यंत्र के इस्तेमाल के कानूनी पहलू अलग-अलग हैं। अजान धार्मिक गतिविधि के रूप में जारी रह सकती है, लेकिन लाउडस्पीकर का इस्तेमाल Noise Pollution (Regulation and Control) Rules, 2000 और अदालत द्वारा पहले दिए गए निर्देशों के अधीन रहेगा।

क्या है पूरा मामला?
मामला सहारनपुर जिले के गागलहेड़ी थाना क्षेत्र के पठेड़ गांव स्थित आयशा मस्जिद से जुड़ा है। स्थानीय स्तर पर इस मस्जिद को करीब 80 वर्ष पुराना बताया जा रहा है। मस्जिद से जुड़े लोगों के अनुसार यहां लंबे समय से नमाज अदा की जाती रही है।
करीब तीन महीने पहले मस्जिद से होने वाली पांच वक्त की अजान को लेकर ध्वनि प्रदूषण की शिकायत सामने आई। इसके बाद पुलिस-प्रशासन की ओर से लाउडस्पीकर के इस्तेमाल को लेकर कार्रवाई की गई और अजान के लिए ध्वनि-विस्तारक यंत्र के इस्तेमाल पर रोक लग गई।
मस्जिद से जुड़े लोगों ने इस कार्रवाई का विरोध करते हुए स्थानीय अधिकारियों के सामने अपनी बात रखी। उनका कहना था कि अजान धार्मिक गतिविधि का हिस्सा है और निर्धारित नियमों का पालन करते हुए इसे जारी रखने की अनुमति मिलनी चाहिए। हालांकि, स्थानीय स्तर पर मामला पूरी तरह हल नहीं हो सका।
इसके बाद विवाद कानूनी लड़ाई में बदल गया।
जुलाई में हाईकोर्ट पहुंचा मामला
मस्जिद से जुड़े शहनवाज खान और पांच अन्य लोगों ने जुलाई 2026 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल की। याचिका में आयशा मस्जिद में पांच वक्त की अजान की अनुमति और अजान के लिए लाउडस्पीकर के इस्तेमाल को लेकर पुलिस-प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठाए गए।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में यह पक्ष रखा गया कि अजान को लेकर स्थानीय स्तर पर उन्हें रोका जा रहा है, जबकि इस संबंध में पहले भी न्यायिक फैसले आ चुके हैं। दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि प्रशासन का उद्देश्य अजान पर रोक लगाना नहीं, बल्कि ध्वनि प्रदूषण से जुड़े कानूनी नियमों का पालन कराना है।
यहीं से मामले में एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर सामने आया—अजान करने का अधिकार और अजान के लिए लाउडस्पीकर का इस्तेमाल, दोनों को एक ही चीज नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट ने क्या निर्देश दिया?
इलाहाबाद हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की। अदालत ने याचिका का निस्तारण करते हुए कहा कि यदि याचिकाकर्ता ध्वनि प्रदूषण से जुड़े नियमों और हाईकोर्ट के पूर्व निर्देशों का पालन करने का लिखित आश्वासन देते हैं, तो पुलिस और जिला प्रशासन को आयशा मस्जिद में पांच वक्त की अजान में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
अदालत ने याचिकाकर्ताओं को संबंधित नियमों और पूर्व न्यायिक निर्देशों का पालन करने के संबंध में हस्ताक्षरयुक्त नोटरीकृत हलफनामा दाखिल करने को कहा है।
यानी हाईकोर्ट के आदेश का आधार यह है कि धार्मिक गतिविधि को केवल इसलिए बाधित न किया जाए कि उससे जुड़ा विवाद चल रहा है, लेकिन साथ ही ध्वनि प्रदूषण के कानूनों का उल्लंघन भी न होने दिया जाए।
लाउडस्पीकर को लेकर क्या है कानूनी स्थिति?
इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू लाउडस्पीकर का इस्तेमाल है। हाईकोर्ट के पूर्व के एक फैसले का भी सुनवाई के दौरान संदर्भ आया। वर्ष 2020 के अफजल अंसारी मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अजान और लाउडस्पीकर के इस्तेमाल को अलग-अलग कानूनी पहलुओं के रूप में देखा था।
अदालत ने उस मामले में माना था कि अजान धार्मिक आस्था और इस्लामी परंपरा का हिस्सा हो सकती है, लेकिन अजान के लिए लाउडस्पीकर या अन्य ध्वनि-विस्तारक उपकरण का इस्तेमाल अपने आप में ऐसा मौलिक धार्मिक अधिकार नहीं है, जिसे ध्वनि प्रदूषण से जुड़े कानूनों से ऊपर माना जाए। ऐसे उपकरणों का इस्तेमाल सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य और ध्वनि प्रदूषण से संबंधित नियमों के अधीन रहेगा।
इसी कानूनी स्थिति को मौजूदा मामले में भी महत्वपूर्ण माना गया है।

रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक क्या होगा?
ध्वनि प्रदूषण से जुड़े नियमों के तहत लाउडस्पीकर और अन्य ध्वनि-विस्तारक उपकरणों के इस्तेमाल पर रात के समय विशेष प्रतिबंध लागू हैं। सामान्य तौर पर रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक ऐसे उपकरणों के इस्तेमाल की अनुमति नहीं होती, जब तक कानून के तहत विशेष अनुमति की स्थिति न हो।
इसलिए हाईकोर्ट का ताजा आदेश यह नहीं कहता कि मस्जिद में लाउडस्पीकर का इस्तेमाल किसी भी समय और किसी भी आवाज में किया जा सकता है। नियमों के मुताबिक ध्वनि सीमा, समय और अन्य कानूनी शर्तों का पालन करना आवश्यक रहेगा।
नियमों का उल्लंघन हुआ तो प्रशासन कार्रवाई कर सकता है
हाईकोर्ट ने पुलिस और जिला प्रशासन को पूरी तरह निष्क्रिय रहने का निर्देश नहीं दिया है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि याचिकाकर्ताओं को नियमों के पालन का हलफनामा देना होगा और प्रशासन यह सुनिश्चित करेगा कि उस आश्वासन का पालन हो रहा है।
यदि भविष्य में ध्वनि प्रदूषण संबंधी नियमों या अदालत के निर्देशों का उल्लंघन होता है, तो पुलिस और प्रशासन कानून के अनुसार कार्रवाई कर सकते हैं।
इसका मतलब यह है कि अदालत ने एक तरफ धार्मिक गतिविधि में अनावश्यक हस्तक्षेप से सुरक्षा दी है, तो दूसरी तरफ ध्वनि प्रदूषण के नियमों को भी पूरी तरह प्रभावी रखा है।
तीन महीने में शिकायत से हाईकोर्ट तक पहुंचा मामला
पूरे घटनाक्रम को आसान भाषा में समझें तो मामला करीब तीन महीने पहले शुरू हुआ। आयशा मस्जिद में अजान के दौरान लाउडस्पीकर के इस्तेमाल को लेकर शिकायत हुई। इसके बाद पुलिस-प्रशासन ने कार्रवाई की और लाउडस्पीकर से अजान पर रोक लग गई।
मस्जिद से जुड़े लोगों ने स्थानीय अधिकारियों से समाधान की मांग की, लेकिन जब मामला सुलझ नहीं पाया तो जुलाई में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया। करीब तीन महीने चली कानूनी प्रक्रिया के बाद अदालत ने अब नियमों के पालन की शर्त के साथ याचिका का निस्तारण कर दिया है।
याचिकाकर्ता शहनवाज खान के अनुसार, अदालत के आदेश की प्रति संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को उपलब्ध कराई जाएगी और न्यायालय के निर्देशों का पालन किया जाएगा। मस्जिद के इमाम उमेर ने भी नियमों का पालन करने की बात कही है।

प्रशासन की भूमिका अब क्या रहेगी?
हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब स्थानीय प्रशासन की भूमिका भी स्पष्ट हो गई है। एक ओर उसे यह देखना होगा कि निर्धारित नियमों का उल्लंघन न हो, वहीं दूसरी ओर नियमों का पालन किए जाने की स्थिति में पांच वक्त की अजान में अनावश्यक हस्तक्षेप से बचना होगा।
यानी आगे का पूरा मामला धार्मिक स्वतंत्रता और ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण के बीच कानूनी संतुलन पर आधारित रहेगा।
सहारनपुर की आयशा मस्जिद का मामला इस वजह से भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें अदालत ने धार्मिक गतिविधि और लाउडस्पीकर के इस्तेमाल के बीच अंतर को फिर से स्पष्ट किया है। इससे यह बात सामने आती है कि धार्मिक गतिविधि को कानून के दायरे में रहते हुए जारी रखा जा सकता है, लेकिन ध्वनि-विस्तारक उपकरणों के इस्तेमाल के लिए संबंधित नियमों का पालन अनिवार्य है।
अब आगे क्या होगा?
अब याचिकाकर्ताओं को अदालत के निर्देश के अनुसार नियमों के पालन का नोटरीकृत हलफनामा दाखिल करना होगा। इसके बाद, आदेश की शर्तों के अनुसार, पुलिस और जिला प्रशासन को पांच वक्त की अजान में हस्तक्षेप नहीं करना होगा।
हालांकि, यदि ध्वनि प्रदूषण संबंधी नियमों का उल्लंघन सामने आता है तो प्रशासन को कानून के अनुसार कार्रवाई करने का अधिकार रहेगा।
इस तरह करीब तीन महीने से चला आ रहा सहारनपुर की आयशा मस्जिद का अजान विवाद फिलहाल अदालत के निर्देश के बाद एक स्पष्ट कानूनी ढांचे में आ गया है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि मस्जिद प्रबंधन की ओर से नियमों का पालन किस तरह किया जाता है और स्थानीय प्रशासन अदालत के आदेश को किस तरह लागू करता है।
पूरे मामले का सार एक नजर में
शिकायत हुई → लाउडस्पीकर से अजान पर रोक → स्थानीय स्तर पर समाधान की कोशिश → जुलाई 2026 में हाईकोर्ट में याचिका → करीब तीन महीने तक कानूनी प्रक्रिया → हाईकोर्ट का अहम निर्देश → नियमों का पालन करने पर पांच वक्त की अजान में प्रशासन हस्तक्षेप नहीं करेगा।
JN News निष्कर्ष: सहारनपुर की आयशा मस्जिद से जुड़े अजान विवाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने धार्मिक गतिविधि और ध्वनि प्रदूषण नियमों के बीच संतुलन कायम करते हुए निर्देश दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया है कि नियमों का पालन होने की स्थिति में पुलिस और जिला प्रशासन पांच वक्त की अजान में हस्तक्षेप नहीं करेगा। वहीं, लाउडस्पीकर के इस्तेमाल को ध्वनि प्रदूषण संबंधी नियमों और अदालत के पूर्व निर्देशों के अधीन रखा गया है। नियमों का उल्लंघन होने पर प्रशासन कानून के अनुसार कार्रवाई कर सकता है।






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