Allahabad High Court on Newborn Death: उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने गंभीर चिंता जताई है। सुल्तानपुर से लखनऊ इलाज के लिए लाए गए एक नवजात की मौत के मामले में कोर्ट ने राज्य सरकार को पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ जांच कराने का निर्देश दिया है। जांच रिपोर्ट 15 दिन के भीतर कोर्ट में पेश करनी होगी।
यह मामला उस समय सामने आया जब जन्म के बाद गंभीर स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहे नवजात को इलाज के लिए सुल्तानपुर से लखनऊ रेफर किया गया। परिवार बच्चे को लखनऊ के अलग-अलग बड़े सरकारी चिकित्सा संस्थानों में लेकर पहुंचा, लेकिन इलाज और जरूरी सुविधाओं की उपलब्धता को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी। इसी घटनाक्रम के बीच नवजात की मौत हो गई।
हाईकोर्ट ने इस मामले को केवल एक बच्चे की मौत तक सीमित नहीं माना, बल्कि प्रदेश में गंभीर मरीजों के लिए चिकित्सा सुविधाओं, रेफरल व्यवस्था और लखनऊ के बड़े अस्पतालों पर बढ़ते दबाव से जुड़े व्यापक सवाल भी उठाए हैं।

सुल्तानपुर से लखनऊ तक अस्पतालों के चक्कर
कोर्ट के सामने आए मामले के अनुसार नवजात को ऐसी स्वास्थ्य समस्या थी, जिसमें तत्काल चिकित्सा सहायता की जरूरत थी। बच्चे को सुल्तानपुर से लखनऊ के रेफरल अस्पताल लाया गया।
परिवार बच्चे को सबसे पहले किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) लेकर पहुंचा। इसके बाद उसे डॉ. राम मनोहर लोहिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (RMLIMS) और फिर संजय गांधी पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (SGPGI) ले जाया गया। कोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक, इस पूरी प्रक्रिया के दौरान जरूरी चिकित्सा सुविधा और बेड की उपलब्धता को लेकर स्थिति सामने आई।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक नवजात का जन्म सुल्तानपुर में 25 जुलाई 2026 को हुआ था और जन्म के बाद उसमें गंभीर जटिलताएं सामने आई थीं। अगले दिन उसकी मौत हो गई।
KGMU में बेड को लेकर सामने आए अलग-अलग पक्ष
सुनवाई के दौरान KGMU की ओर से कोर्ट को बताया गया कि बच्चे को एंबुलेंस से अस्पताल लाया गया था। डॉक्टरों के अनुसार उस समय नवजात गहन चिकित्सा इकाई में बेड उपलब्ध नहीं था और परिजनों को बच्चे को संबंधित यूनिट तक लाने के लिए कहा गया था।
वहीं, परिवार की ओर से अलग पक्ष रखा गया। परिवार का कहना था कि उन्हें बच्चे को दूसरे अस्पताल ले जाने के लिए कहा गया और उन्होंने एंबुलेंस में ही बच्चे की जांच किए जाने का अनुरोध भी किया था।
हाईकोर्ट ने इन दोनों पक्षों को रिकॉर्ड में लिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस स्तर पर उसने किसी डॉक्टर या अस्पताल की लापरवाही का निष्कर्ष नहीं निकाला है। अगर जांच में जरूरी उपचार या सुविधाएं उपलब्ध कराने में कोई कमी सामने आती है, तभी आगे जवाबदेही तय करने पर विचार किया जाएगा।

गंभीर मरीजों को अस्पतालों के बीच भटकने से रोकने पर जोर
हाईकोर्ट ने मामले से जुड़े व्यापक पहलू पर भी ध्यान दिया। कोर्ट ने कहा कि अगर गंभीर मरीजों को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल भेजा जाता है, तो रेफरल से पहले यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि संबंधित अस्पताल में आवश्यक बेड और चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हैं या नहीं।
कोर्ट ने मरीजों को अस्पतालों के बीच अनावश्यक रूप से भेजे जाने से रोकने के लिए ऑनलाइन रेफरल व्यवस्था जैसे विकल्प पर भी विचार करने की बात कही। ऐसी व्यवस्था में रेफर करने वाला अस्पताल पहले संबंधित अस्पताल में बेड और जरूरी सुविधाओं की उपलब्धता की पुष्टि कर सकेगा। इससे गंभीर मरीजों का कीमती समय बचाया जा सकता है।
लखनऊ के अस्पतालों पर दबाव कम करने के लिए विकेंद्रीकरण पर जोर
हाईकोर्ट ने कहा कि प्रदेश में स्वास्थ्य सुविधाओं का विकेंद्रीकरण जरूरी है। यदि गंभीर मरीजों को हर स्थिति में लखनऊ के बड़े चिकित्सा संस्थानों का रुख करना पड़ेगा तो इन अस्पतालों पर लगातार दबाव बढ़ता रहेगा।
कोर्ट ने नए मेडिकल कॉलेजों को पर्याप्त बुनियादी ढांचे के साथ विकसित करने की जरूरत बताई। इनमें विशेषज्ञ और सुपर-स्पेशियलिटी सेवाओं के साथ वेंटिलेटर जैसी जीवनरक्षक सुविधाएं उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया, ताकि मरीजों को इलाज के लिए दूर-दराज के शहरों तक न जाना पड़े।

एंबुलेंस की सुविधाओं पर भी कोर्ट की चिंता
कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि जब किसी गंभीर मरीज या नवजात को सुल्तानपुर से लखनऊ जैसे रेफरल सेंटर तक ले जाया जा रहा हो, तो एंबुलेंस में उसकी स्थिति के अनुरूप आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं होनी चाहिए।
मामले में कोर्ट ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि नवजात को तत्काल चिकित्सा सहायता की आवश्यकता थी और उसे सुल्तानपुर से लखनऊ रेफर किया गया था। ऐसे मामलों में केवल मरीज को दूसरे अस्पताल तक पहुंचाना पर्याप्त नहीं, बल्कि रास्ते में भी जरूरी चिकित्सा सहायता उपलब्ध होना महत्वपूर्ण है।
स्वास्थ्य बजट की जानकारी भी मांगी
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने राज्य में चिकित्सा सुविधाओं और सेवाओं के लिए बजट में किए जाने वाले प्रावधान की जानकारी भी मांगी। कोर्ट ने इससे पहले भी इस संबंध में जानकारी मांगे जाने का उल्लेख किया।
कोर्ट ने कहा कि वित्तीय संसाधनों की कमी नागरिकों को बेहतर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने में बाधा नहीं बननी चाहिए। राज्य को नागरिकों के लिए उच्च गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवाओं को प्राथमिकता देनी चाहिए।
परिवार का पक्ष भी जांच में होगा शामिल
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को पूरे घटनाक्रम की ऑब्जेक्टिव और फेयर जांच कराने का निर्देश दिया है। जांच के दौरान मृत नवजात के परिवार का पक्ष भी दर्ज करने और उसे जांच में शामिल करने को कहा गया है।
कोर्ट ने कहा कि जांच से यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि बच्चे को आवश्यक उपचार और चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने में कहीं कोई कमी तो नहीं रही। यदि जांच में किसी स्तर पर लापरवाही या सुविधा की कमी सामने आती है तो आगे जिम्मेदारी तय करने पर विचार किया जा सकता है।
कोर्ट ने यह भी कहा है कि यदि जांच में राज्य या संबंधित अधिकारियों की लापरवाही सामने आती है तो परिवार को मुआवजा दिए जाने के सवाल पर भी विचार किया जा सकता है।
15 दिन में देनी होगी जांच रिपोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने राज्य सरकार को पूरी घटना की जांच कर 15 दिन के भीतर रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 1 अक्टूबर 2026 को निर्धारित की गई है।
क्या है इस मामले का बड़ा सवाल?
यह मामला उत्तर प्रदेश में गंभीर मरीजों और नवजातों के लिए समय पर उपलब्ध चिकित्सा सुविधाओं, अस्पतालों में बेड, वेंटिलेटर और विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता तथा रेफरल सिस्टम की कार्यप्रणाली से जुड़े सवाल सामने लाता है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने अभी किसी डॉक्टर या अस्पताल को इस घटना के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया है। जिम्मेदारी तभी तय होगी जब सरकार की जांच में इलाज या जरूरी चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने में कोई कमी या लापरवाही साबित होती है।
कोर्ट की सुनवाई से यह भी स्पष्ट है कि मामला केवल एक अस्पताल या एक घटना तक सीमित नहीं है। अदालत प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में चिकित्सा सुविधाओं को मजबूत करने और मरीजों को इलाज के लिए एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल के बीच भटकने से रोकने के लिए व्यापक व्यवस्था पर भी विचार कर रही है।






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