भारत के कार्बन उत्सर्जन पर विदेशी महिला ने उठाए सवाल, पीयूष गोयल ने दिया जवाब; वायरल हुआ VIDEO

भारत के कार्बन उत्सर्जन पर विदेशी महिला ने उठाए सवाल, पीयूष गोयल ने दिया जवाब; वायरल हुआ VIDEO

Piyush Goyal on Carbon Emission: भारत पर ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को लेकर सवाल उठाए जाने के बीच केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल का एक बयान चर्चा में है। बर्लिन ग्लोबल डायलॉग के दौरान जलवायु परिवर्तन से जुड़े मुद्दे पर अपनी बात रखते हुए गोयल ने विकसित देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी और विकासशील देशों को जलवायु वित्त उपलब्ध कराने के वादों पर सवाल उठाए। उनके बयान का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

नई दिल्ली। जलवायु परिवर्तन और कार्बन उत्सर्जन को लेकर दुनिया भर में बहस जारी है। एक ओर विकासशील देशों से उत्सर्जन कम करने की अपेक्षा की जाती है, वहीं दूसरी ओर भारत जैसे देशों का कहना है कि जलवायु संकट के लिए जिम्मेदारी तय करते समय विकसित देशों के ऐतिहासिक उत्सर्जन और उनकी आर्थिक क्षमता को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। इसी मुद्दे पर केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का पक्ष रखते हुए विकसित देशों से अपनी जिम्मेदारी निभाने की बात कही।

भारत के कार्बन उत्सर्जन पर विदेशी महिला ने उठाए सवाल, पीयूष गोयल ने दिया जवाब; वायरल हुआ VIDEO

भारत की आबादी और कार्बन उत्सर्जन का मुद्दा उठाया

पीयूष गोयल ने भारत की बड़ी आबादी और वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में देश की हिस्सेदारी के बीच अंतर का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि दुनिया की लगभग 17 प्रतिशत आबादी भारत में रहती है, जबकि वैश्विक उत्सर्जन में भारत का योगदान तुलनात्मक रूप से कम है। उन्होंने विकसित देशों के ऐतिहासिक उत्सर्जन और प्रति व्यक्ति उत्सर्जन के आंकड़ों को भी बहस का अहम हिस्सा बताया।

गोयल का तर्क था कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की जिम्मेदारी केवल विकासशील देशों पर नहीं डाली जा सकती। जिन देशों ने लंबे समय तक औद्योगिक विकास के दौरान बड़ी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन किया है, उन्हें भी अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए। उनके अनुसार, जलवायु संकट का समाधान तभी प्रभावी हो सकता है, जब सभी देश अपनी क्षमता और ऐतिहासिक भूमिका के अनुसार योगदान दें।

विकसित देशों की जिम्मेदारी पर सवाल

बर्लिन ग्लोबल डायलॉग के दौरान गोयल ने विकसित पश्चिमी देशों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि पर्यावरण को हुए नुकसान की भरपाई और जलवायु परिवर्तन से निपटने में अमीर देशों को अधिक योगदान देना चाहिए। उन्होंने विकासशील देशों को वित्तीय सहायता के साथ-साथ आधुनिक तकनीक उपलब्ध कराने की जरूरत पर भी जोर दिया।

भारत लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय जलवायु वार्ताओं में इस बात की वकालत करता रहा है कि जलवायु कार्रवाई के दौरान विकासशील देशों की विकास संबंधी जरूरतों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। भारत के सामने ऊर्जा की बढ़ती मांग, औद्योगिक विकास, रोजगार और करोड़ों लोगों के जीवन स्तर में सुधार जैसी चुनौतियां भी हैं। ऐसे में स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ते हुए आर्थिक विकास को बनाए रखना देश की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल है।

100 अरब डॉलर के जलवायु वित्त वादे का जिक्र

पीयूष गोयल ने विकसित देशों की ओर से जलवायु वित्त उपलब्ध कराने के वादे का मुद्दा भी उठाया। पेरिस जलवायु समझौते के तहत विकसित देशों ने विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद देने के लिए वित्तीय संसाधन जुटाने की प्रतिबद्धता जताई थी। इस सहायता का उद्देश्य स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देना, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने की क्षमता विकसित करना और कमजोर देशों को जरूरी संसाधन उपलब्ध कराना है।

गोयल ने आरोप लगाया कि जलवायु वित्त को लेकर किए गए वादों को पूरा करने में विकसित देशों का प्रदर्शन अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं रहा। उन्होंने कहा कि विकासशील देशों को जलवायु संबंधी योजनाएं लागू करने के लिए केवल आश्वासन नहीं, बल्कि वास्तविक वित्तीय और तकनीकी सहयोग की जरूरत है।

छोटे द्वीपीय देशों और जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक संवेदनशील क्षेत्रों के लिए यह सहायता विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। समुद्र के बढ़ते स्तर, चरम मौसम की घटनाओं और प्राकृतिक आपदाओं का सामना कर रहे इन देशों के पास सीमित संसाधन होते हैं। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय सहयोग उनकी सुरक्षा और विकास के लिए अहम माना जाता है।

यूरोपीय संघ के कार्बन नियमों पर भी बहस

जलवायु नीति से जुड़े एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे पर भी चर्चा हो रही है—यूरोपीय संघ का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म यानी CBAM। यह व्यवस्था कुछ आयातित वस्तुओं के उत्पादन से जुड़े कार्बन उत्सर्जन को ध्यान में रखती है और उन पर कार्बन लागत लागू करने से संबंधित है।

इस तरह के नियमों को लेकर भारत सहित कई विकासशील देशों में चिंता जताई जाती रही है। उनका तर्क है कि यदि कार्बन से जुड़े अतिरिक्त खर्च व्यापार पर प्रभाव डालते हैं, तो विकासशील देशों के उत्पादकों और उद्योगों पर इसका बोझ बढ़ सकता है। दूसरी ओर, यूरोपीय संघ इन उपायों को कार्बन उत्सर्जन कम करने और कार्बन लागत में अंतर को संबोधित करने की अपनी नीति का हिस्सा बताता है।

इस मुद्दे पर भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार तथा जलवायु नीति से जुड़ी चर्चा आगे भी महत्वपूर्ण बनी रह सकती हैं।

भारत के कार्बन उत्सर्जन पर विदेशी महिला ने उठाए सवाल, पीयूष गोयल ने दिया जवाब; वायरल हुआ VIDEO

भारत में स्वच्छ ऊर्जा और उत्सर्जन पर नजर

भारत दुनिया के प्रमुख ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक देशों में शामिल है, लेकिन प्रति व्यक्ति उत्सर्जन के मामले में उसकी स्थिति कई विकसित अर्थव्यवस्थाओं से अलग है। भारत में ऊर्जा की मांग और औद्योगिक गतिविधियों में वृद्धि के साथ उत्सर्जन कम करना एक बड़ी चुनौती है। इसी कारण सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और स्वच्छ तकनीकों को बढ़ावा देने पर जोर दिया जा रहा है।

हालांकि, कुल उत्सर्जन और प्रति व्यक्ति उत्सर्जन दो अलग-अलग पैमाने हैं। किसी देश के कुल उत्सर्जन पर उसकी आबादी, अर्थव्यवस्था के आकार और ऊर्जा की खपत का प्रभाव पड़ता है, जबकि प्रति व्यक्ति उत्सर्जन औसतन एक व्यक्ति से जुड़े उत्सर्जन को दर्शाता है। इसलिए जलवायु नीति पर चर्चा करते समय दोनों आंकड़ों और ऐतिहासिक उत्सर्जन को समझना जरूरी है।

पीयूष गोयल का बयान इसी व्यापक बहस का हिस्सा है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने में जिम्मेदारी किस तरह साझा की जाए और विकासशील देशों को स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ने के लिए किस स्तर पर मदद मिलनी चाहिए।

सोशल मीडिया पर वायरल हुआ बयान

बर्लिन ग्लोबल डायलॉग के दौरान दिए गए बयान का वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किया जा रहा है। इसमें गोयल विकसित देशों की जिम्मेदारी, भारत के उत्सर्जन और जलवायु वित्त से जुड़े सवाल उठाते नजर आते हैं। उनके बयान को भारत के पक्ष को अंतरराष्ट्रीय मंच पर रखने के संदर्भ में देखा जा रहा है।

जलवायु परिवर्तन पर वैश्विक सहमति बनाने के लिए उत्सर्जन में कटौती के साथ वित्तीय सहायता, तकनीकी सहयोग और विकासशील देशों की जरूरतों पर चर्चा भी जरूरी है। ऐसे में आने वाले समय में यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय बैठकों और व्यापारिक वार्ताओं में चर्चा का विषय बना रह सकता है।

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