नई दिल्ली
आज पूरे देश में बसंत पंचमी (माघ शुक्ल पंचमी) बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाई जा रही है। यह पर्व देवी सरस्वती की जन्मतिथि के रूप में जाना जाता है और ज्ञान, विद्या, कला, संगीत और वाणी की देवी की पूजा का प्रमुख अवसर है। बसंत पंचमी न केवल धार्मिक महत्व रखती है, बल्कि यह ऋतु परिवर्तन का भी प्रतीक है – सर्दी का अंत और बसंत का आगमन। इस दिन देशभर में पीले वस्त्र पहने जाते हैं, पीले फूलों से पूजा की जाती है और केसरिया भोजन बनाकर वितरित किया जाता है।

बसंत पंचमी का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, आज के दिन ही देवी सरस्वती का जन्म हुआ था। पुराणों में वर्णन है कि ब्रह्मा जी ने सृष्टि रचना के बाद ज्ञान और वाणी की आवश्यकता महसूस की। तब उन्होंने अपनी शक्ति से देवी सरस्वती का अवतार किया। इसीलिए बसंत पंचमी को सरस्वती जयंती भी कहा जाता है।
स्कूल-कॉलेजों में छोटे बच्चे आज पहली बार किताब छूकर अक्षरारंभ करते हैं। माता-पिता अपने बच्चों को आज ही पढ़ाई शुरू करवाते हैं। यह दिन नई शुरुआत, नई सीख और नई ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है।

बसंत पंचमी से जुड़ी प्रमुख मान्यताएं
- पीला रंग: पीला रंग बसंत का प्रतीक है। इस दिन पीले वस्त्र, पीले फूल (गेंदा, सरसों) और केसर का उपयोग शुभ माना जाता है।
- सरोवर पर पूजा: मान्यता है कि देवी सरस्वती सफेद हंस पर सवार होकर सरोवर के किनारे विराजमान होती हैं। इसलिए कई जगह सरोवर या नदी किनारे विशेष पूजा होती है।
- पतंगबाजी: उत्तर भारत में बसंत पंचमी को पतंग उड़ाने का भी चलन है। यह परंपरा बसंत के आगमन और खुशी का प्रतीक है।
- केसरिया भोजन: इस दिन केसरिया खीर, हलवा, बेसन के लड्डू और पीले चावल बनाए जाते हैं। दान-पुण्य का भी विशेष महत्व है।
- सूर्य देव की पूजा: कुछ क्षेत्रों में सूर्य देव को अर्घ्य देने की परंपरा है, क्योंकि आज से दिन लंबे होने लगते हैं।
उत्तराखंड में बसंत पंचमी की खास परंपराएं
देवभूमि उत्तराखंड में बसंत पंचमी को विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता है।
- शांतिकुंज, हरिद्वार: गायत्री परिवार में बड़े स्तर पर सरस्वती पूजा और हवन होता है।
- ऋषिकेश और हरिद्वार: गंगा किनारे सरस्वती मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना।
- गढ़वाल-कुमाऊं: घरों में पीले फूलों से सजावट, बच्चों को नई किताबें छूवाने की परंपरा और लोक गीतों का आयोजन।
- स्कूलों में: राज्य भर के स्कूलों में आज सरस्वती पूजा और अक्षरारंभ समारोह आयोजित किए गए।

वैज्ञानिक और पर्यावरणीय महत्व
बसंत पंचमी का समय प्रकृति में बदलाव का होता है। ठंड कम होती है, फूल खिलने लगते हैं और फसलें लहलहाने लगती हैं। यह मौसम परिवर्तन का प्रतीक है। पीले रंग का महत्व इसलिए भी है क्योंकि सरसों के खेत पीले हो जाते हैं। आज के दिन पीले फूलों और वस्त्रों का उपयोग पर्यावरण संतुलन और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है।
पूजा विधि और शुभ मुहूर्त (2026)
इस साल बसंत पंचमी का शुभ मुहूर्त:
- अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:45 से दोपहर 12:35 तक
- सरस्वती पूजा का मुख्य समय: सुबह 7:00 से 12:00 बजे तक
पूजा विधि:
- पीले वस्त्र पहनें
- सफेद या पीले फूलों से देवी सरस्वती की मूर्ति या चित्र सजाएं
- वीणा, किताब और कलम रखकर पूजा करें
- सफेद मिठाई या केसरिया भोजन का भोग लगाएं
- बच्चों को नई किताब छूवाएं और पढ़ाई शुरू करवाएं
बसंत पंचमी हमें ज्ञान, विद्या और सकारात्मकता की याद दिलाती है। इस पर्व पर सभी छात्र-छात्राओं और विद्या चाहने वालों को शुभकामनाएं।
शुभ बसंत पंचमी! 🌸📚
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