होली का नाम सुनते ही रंगों, गुलाल, पानी की पिचकारियों और ठिठोली का ख्याल आता है, लेकिन काशी (वाराणसी) में होली एकदम अलग अंदाज में मनाई जाती है। यहां की मसान होली या भस्म होली सिर्फ उत्सव नहीं, बल्कि गहरी आध्यात्मिक परंपरा है। ये होली रंगों से नहीं, बल्कि श्मशान की चिता से निकली भस्म (राख) से खेली जाती है। दुनिया भर से लोग इसे देखने आते हैं, लेकिन इस साल 2026 में इस परंपरा को लेकर काफी विवाद खड़ा हो गया है।

मसान होली कब और कहां मनाई जाती है?
इस साल रंगभरी एकादशी 27 फरवरी 2026 (शुक्रवार) को मनाई जा रही है। इसके अगले दिन यानी 28 फरवरी 2026 (शनिवार) को मसान होली का मुख्य आयोजन होगा।
- हरिश्चंद्र घाट पर सुबह से शुरुआत होती है।
- मणिकर्णिका घाट पर दोपहर या शाम में मुख्य भस्म होली खेली जाती है।
परंपरा के मुताबिक, रंगभरी एकादशी के बाद महाश्मशान नाथ (बाबा काल भैरव या महाकाल) की विशेष आरती होती है। उसके बाद साधु-संत, अघोरी, नागा बाबा और शिवभक्त भस्म लगाकर होली खेलते हैं। ढोल-डमरू की थाप, “हर-हर महादेव” के जयकारे और मंत्रोच्चार से पूरा घाट शिवमय हो जाता है।
भस्म से होली क्यों खेली जाती है? आध्यात्मिक महत्व क्या है?
काशी में मसान होली भगवान शिव से सीधे जुड़ी हुई मानी जाती है। मान्यता है कि भगवान शिव खुद अपने गणों के साथ श्मशान में भस्म से होली खेलते हैं। ये परंपरा जीवन-मृत्यु के चक्र को समझाने का माध्यम है –
- शरीर अंत में राख ही बनता है, इसलिए अहंकार छोड़ो।
- भस्म लगाना वैराग्य, मोक्ष और शिवत्व की प्राप्ति का प्रतीक है।
- काशी को महाश्मशान कहा जाता है, जहां मरने वाले को मोक्ष मिलता है। यहां भस्म से होली खेलना शिव के साथ एकाकार होने जैसा माना जाता है।
ये सिर्फ खेल नहीं, बल्कि गहरी साधना और जीवन के सत्य को स्वीकार करने का तरीका है।

कौन खेल सकता है मसान होली?
मुख्य रूप से इसमें शामिल होते हैं –
- अघोरी साधु
- नागा बाबा
- संन्यासी और शिवभक्त
आम लोग और पर्यटक भी देखने आते हैं, लेकिन धार्मिक जानकार सलाह देते हैं कि भस्म से सीधे होली खेलने में सिर्फ परंपरा से जुड़े साधु ही हिस्सा लें। बाकी लोग दूर से दर्शन करें और सम्मान रखें।
इस साल क्यों हो रहा है विवाद?
2026 में मसान होली को लेकर काशी में तनाव बढ़ गया है। काशी विद्वत परिषद, सनातन रक्षक दल, डोम राजा परिवार और कई धार्मिक संगठनों ने इसका विरोध किया है। उनका कहना है –
- श्मशान घाट पवित्र स्थान है, यहां अंतिम संस्कार होता है – उत्सव या जश्न मनाने की जगह नहीं।
- ये परंपरा शास्त्रों में नहीं मिलती, बल्कि हाल के वर्षों में सोशल मीडिया की वजह से लोकप्रिय हुई है।
- यहां नशा, शोर-शराबा और भीड़ से मर्यादा भंग होती है।
- प्रशासन से रोक लगाने की मांग की जा रही है।
दूसरी तरफ आयोजक और समर्थक इसे सदियों पुरानी काशी की परंपरा बताते हैं, जो शिवभक्ति और वैराग्य से जुड़ी है। वे कहते हैं कि ये आस्था का विषय है, इसे रोका नहीं जाना चाहिए।

क्या देखने लायक है या दूर रहें?
मसान होली काशी की अनोखी पहचान है – रहस्यमय, आध्यात्मिक और थोड़ी डरावनी भी। अगर आप वाराणसी में हैं तो दूर से देख सकते हैं, लेकिन सम्मान और संवेदनशीलता जरूरी है। ये सिर्फ फोटो-वीडियो के लिए नहीं, बल्कि जीवन-मृत्यु के गहन संदेश को समझने का मौका है।
आप क्या सोचते हैं – ये परंपरा बनी रहनी चाहिए या बदलाव की जरूरत है? कमेंट में बताएं।
हर-हर महादेव! जय होली! 🔱🌺







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