जालौन में दशहरा की तैयारी, धनुताल के मैदान में 5 दशक से 40 फीट ऊंचे रावण-मेघनाद के पुतले बनाते चले आ रहे पीढ़ी दर पीढ़ी मुस्लिम कारीगर

जालौन में दशहरा की तैयारी, धनुताल के मैदान में 5 दशक से 40 फीट ऊंचे रावण-मेघनाद के पुतले बनाते चले आ रहे पीढ़ी दर पीढ़ी मुस्लिम कारीगर

जालौन के कोंच नगर की रामलीला 173 वर्षों से अनवरत जारी है, यह रामलीला विश्व विख्यात है और लिम्का बुक ऑफ द वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज है इस बार चल रहे रामलीला के 173 वे महोत्सव के बीच दशहरा की तैयारियां जोरों पर चल रही है। नगर के धनुताल के मैदान में मुस्लिम कारीगरों द्वारा 40 फीट ऊंचे रावण और मेघनाथ के पुतले तैयार किया जा रहे हैं

मुस्लिम कारीगर पीढ़ी दर पीढ़ी बना रहे है पुतले

मुस्लिम कारीगर पीढ़ी दर पीढ़ी करीब 5 दशक से यह पुतले तैयार करते चले आ रहे हैं और हिंदू मुस्लिम एकता के साथ गंगा जमीन तहजीब यहां देखने को मिलती है। तैयार होने के बाद यह 40 40 फ़ीट ऊंचे रावण और मेघनाथ की पुतले रथों पर बांधकर पूरे मैदान में दौड़े जाते हैं ऐसा सिर्फ कोंच नगर में ही देखने को मिलता है। और दशहरा मेले को देखने के लिए यहां पर जनसैलाब उमड़ता है और करीब 25 हजार लोगों की भीड़ जुटी है।

जालौन में दशहरा की तैयारी, धनुताल के मैदान में 5 दशक से 40 फीट ऊंचे रावण-मेघनाद के पुतले बनाते चले आ रहे पीढ़ी दर पीढ़ी मुस्लिम कारीगर

वही रविवार को मुस्लिम कारीगरों ने बताया कि यह कार्य हमारे पीढ़ी दर पीढ़ी द्वारा पिछले करीब 50 वर्षों से अनवरत किया जा रहा है जिसमें हम रावण मेघनाथ के पुत्रों के साथ-साथ प्रभु श्री राम और लक्ष्मण भरत शत्रुघ्न के तीर बाड़ इत्यादि भी बनाते हैं।

दरअसल, उत्तर प्रदेश के जालौन के कोंच में मुस्लिम कारीगर दशकों से रावण, मेघनाद और कुंभकरण के पुतले बनाते आ रहे हैं। यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है और इसे हिंदू-मुस्लिम भाईचारे व सामाजिक एकता के प्रतीक के रूप में देखा जाता है, जहाँ मुस्लिम समुदाय दशहरे के उत्सव में सक्रिय रूप से भाग लेता है।

निभाई जा रही है पिछले 173 सालों से यह ऐतिहासिक परंपरा

कोंच में यह ऐतिहासिक परंपरा पिछले 173 सालों से निभाई जा रही है, जब से एक मुस्लिम परिवार ने रावण, मेघनाद और कुंभकरण के पुतले बनाना शुरू किया था। यह कारीगर दशहरे जैसे हिंदू पर्व पर पुतले बनाकर एक मजबूत संदेश देते हैं कि भारत की असली पहचान गंगा-जमुनी तहजीब और आपसी सौहार्द में है। इस काम को मुस्लिम परिवारों में कई पीढ़ियों से सिखाया जाता रहा है। उनके लिए यह सिर्फ रोजगार का साधन नहीं, बल्कि भाईचारे का संदेश फैलाने वाली एक जिम्मेदारी भी है।

दशहरे का यह उत्सव सिर्फ हिंदुओं का नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के उत्सव के रूप में देखा जाता है, जिसमें सभी समुदाय मिलकर भाग लेते हैं। मुस्लिम कारीगर दशहरा के लिए पुतले बनाने का काम करते हैं, जो धार्मिक पहचान से ऊपर उठकर कला और भाईचारे को दर्शाते हैं

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