भाजपा का ‘संचार साथी’ ऐप पर डटकर बचाव: जासूसी के आरोपों को सिरे से खारिज, कहा- यह सुरक्षा का हथियार है, न कि हथियारबंदी का

भाजपा का ‘संचार साथी’ ऐप पर डटकर बचाव: जासूसी के आरोपों को सिरे से खारिज, कहा- यह सुरक्षा का हथियार है, न कि हथियारबंदी का

भारतीय राजनीति में तकनीक और गोपनीयता का मुद्दा हमेशा से गरमाता रहा है। ताजा कड़ी में, भाजपा ने केंद्र सरकार के ‘संचार साथी’ ऐप पर लगे जासूसी के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे “मोबाइल उपकरणों और उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा का मजबूत कवच” करार दिया है। विपक्ष के दावों के बीच, पार्टी का कहना है कि यह ऐप साइबर धमकियों से आम नागरिकों को बचाने का प्रयास है, न कि उनकी निजता पर सेंध लगाने का। लेकिन सवाल यह है—क्या यह सुरक्षा का नाम है या निगरानी का नया रूप? आइए, इस विवाद की परतें खोलते हैं।

भाजपा का 'संचार साथी' ऐप पर डटकर बचाव: जासूसी के आरोपों को सिरे से खारिज, कहा- यह सुरक्षा का हथियार है, न कि हथियारबंदी का

ऐप का उद्देश्य: सुरक्षा या निगरानी?

‘संचार साथी’ ऐप को सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने 2024 के अंत में लॉन्च किया था, जिसका मुख्य लक्ष्य मोबाइल डिवाइसों पर मैलवेयर, फिशिंग अटैक, और अनधिकृत ऐप्स को डिटेक्ट करना है। ऐप यूजर्स को रीयल-टाइम अलर्ट देता है और सरकारी डेटाबेस से चेक करता है कि डिवाइस सिक्योर है या नहीं। भाजपा के आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने मंगलवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “यह ऐप लाखों भारतीयों को साइबर अपराधों से बचाने का सरकारी उपहार है। विपक्ष इसे जासूसी बता रहा है, जो उनकी साजिश है। हमारी सरकार डिजिटल इंडिया को मजबूत कर रही है, न कि डराने का काम।”

मालवीय ने उदाहरण दिया कि पिछले एक साल में ऐप ने 5 लाख से ज्यादा डिवाइसों पर मैलवेयर डिटेक्ट किया, जिससे यूजर्स को 2,000 करोड़ रुपये का नुकसान बचा। उन्होंने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा, “जब हमारी सरकार साइबर सिक्योरिटी पर काम कर रही है, तो कांग्रेस और सपा इसे जासूसी बता रहे हैं। क्या वे चाहते हैं कि भारतीयों का डेटा चीनी ऐप्स के हाथों लूटा जाए?” यह बयान सोमवार को दिल्ली में हुई विपक्षी रैली के बाद आया, जहां सपा नेता अखिलेश यादव ने ऐप को “बिग ब्रदर टूल” करार दिया था।

भाजपा का 'संचार साथी' ऐप पर डटकर बचाव: जासूसी के आरोपों को सिरे से खारिज, कहा- यह सुरक्षा का हथियार है, न कि हथियारबंदी का

विपक्ष का आरोप: निजता का उल्लंघन या राजनीतिक साजिश?

विपक्ष का कहना है कि ‘संचार साथी’ ऐप सरकारी निगरानी का नया हथियार है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा, “यह ऐप यूजर्स का डेटा कलेक्ट करता है और केंद्र को भेजता है। क्या यह संविधान के अनुच्छेद 21 (निजता का अधिकार) का उल्लंघन नहीं?” सपा ने आरोप लगाया कि ऐप विपक्षी नेताओं के फोन ट्रैक करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। यादव ने ट्वीट किया, “सुरक्षा के नाम पर जासूसी? भाजपा का डिजिटल तानाशाही का खेल चल रहा है।”

प्राइवेसी एडवोकेट्स का भी समर्थन विपक्ष को मिला। एक रिपोर्ट में कहा गया कि ऐप यूजर की लोकेशन, ऐप लिस्ट, और कॉल डेटा एक्सेस करता है, जो GDPR जैसे अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन हो सकता है। लेकिन सरकार ने स्पष्ट किया कि ऐप वैकल्पिक है और डेटा एन्क्रिप्टेड रहता है। आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा, “यह ऐप यूजर को सशक्त बनाता है, न कि कमजोर। हम साइबर सिक्योरिटी को मजबूत कर रहे हैं, विपक्ष इसे राजनीतिक रंग दे रहा है।”

ऐप की तकनीकी विशेषताएं: सुरक्षा का दावा या जोखिम?

‘संचार साथी’ ऐप Android/iOS पर उपलब्ध है और AI-बेस्ड स्कैनर यूज करता है। यह मैलवेयर, फेक ऐप्स, और फिशिंग लिंक्स को डिटेक्ट करता है। सरकार का दावा है कि 2025 में 10 लाख डाउनलोड्स के बाद 70% यूजर्स ने सिक्योरिटी अलर्ट्स से फायदा उठाया। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि ऐप सरकारी सर्वर से कनेक्ट होता है, जो डेटा शेयरिंग का जोखिम पैदा करता है। एक साइबर सिक्योरिटी फर्म ने टेस्ट किया, जिसमें पाया गया कि ऐप यूजर की प्राइवेसी पॉलिसी का पालन करता है, लेकिन डेटा स्टोरेज पर सवाल हैं।

भाजपा ने बचाव में कहा कि ऐप ‘डिजिटल इंडिया’ का हिस्सा है, जो 2025 के साइबर थ्रेट्स (जैसे Pegasus जैसी जासूसी) से बचाव करता है। पार्टी प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा, “विपक्ष जब सत्ता में था, तब भी प्राइवेसी के नाम पर कुछ नहीं किया। अब हमारी सरकार सिक्योरिटी दे रही है, तो जासूसी का लेबल लगा रहे हैं।”

विवाद का राजनीतिक आयाम: चुनावी रंग या जनहित?

यह विवाद 2026 के यूपी चुनावों से पहले आया है, जहां प्राइवेसी और साइबर सिक्योरिटी मुद्दा बन सकता है। विपक्ष इसे “डिजिटल सर्विलांस” बता रहा है, जबकि भाजपा इसे “राष्ट्रीय सुरक्षा” का नाम दे रही है। एक सर्वे में 60% यूजर्स ने ऐप को उपयोगी बताया, लेकिन 40% ने प्राइवेसी चिंता जताई। क्या यह ऐप वाकई सुरक्षा देगा, या निजता पर सवाल खड़े करेगा? समय बताएगा।

कुल मिलाकर, भाजपा का बचाव मजबूत है, लेकिन विपक्ष की आवाज़ भी दब नहीं रही। क्या तुम्हें लगता है कि ऐप जासूसी है या सुरक्षा? कमेंट में अपनी राय साझा करें।

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