सहारनपुर, 1 अक्टूबर 2025: उत्तर प्रदेश की राजनीति में ‘आई लव मोहम्मद’ पोस्टर विवाद ने आग लगा दी है। बरेली में जुमे की नमाज के बाद भड़की हिंसा का असर अब सहारनपुर तक पहुंच गया है। मंगलवार देर रात कांग्रेस सांसद इमरान मसूद और समाजवादी पार्टी के विधायक शाहनवाज खान को पुलिस ने हाउस अरेस्ट कर लिया। दोनों नेताओं का बुधवार को बरेली जाकर स्थानीय अधिकारियों से मिलने और स्थिति का जायजा लेने का कार्यक्रम था, लेकिन प्रशासन ने सुरक्षा कारणों का हवाला देकर इसे रोक दिया। इस कार्रवाई ने न केवल समर्थकों में आक्रोश पैदा कर दिया है, बल्कि विपक्षी दलों में लोकतंत्र पर हमले के आरोपों की बाढ़ आ गई है।

घटनाक्रम की शुरुआत: बरेली में पोस्टर विवाद का रूप हिंसा में
यह विवाद कानपुर से शुरू होकर बरेली पहुंचा, जहां 25 सितंबर को आजम नगर इलाके में बच्चों की क्रिकेट बॉल के ‘आई लव मोहम्मद’ पोस्टर पर लगने से छोटी-सी बहस ने तूल पकड़ लिया। मुस्लिम पक्ष ने इसे अपमान माना, जबकि हिंदू पक्ष ने इसे संयोग बताया। लेकिन जुमे (26 सितंबर) की नमाज के बाद मामला फूट पड़ा।
आला हजरत मस्जिद और नौमहला मस्जिद से नमाज अदा करने के बाद सैकड़ों लोग ‘आई लव मोहम्मद’ के बैनर-झंडे लेकर सड़कों पर उतर आए। प्रदर्शनकारी बैरिकेड तोड़ने की कोशिश करने लगे, जिसके जवाब में पुलिस को आंसू गैस छोड़नी पड़ी और फिर लाठीचार्ज करना पड़ा। चार घंटे तक चले इस हंगामे में कई लोग घायल हुए, पथराव और फायरिंग की खबरें आईं। डीआईजी के अनुसार, 95% लोग शांतिपूर्वक नमाज पढ़कर लौट गए थे, लेकिन शरारती तत्वों ने बवाल मचा दिया।

पुलिस ने तुरंत एक्शन लेते हुए 11 एफआईआर दर्ज कीं और मौलाना तौकीर रजा समेत 8 लोगों को गिरफ्तार कर लिया। बरेली में दो दिनों के लिए इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गईं, और भारी पुलिस बल तैनात किया गया। सीएम योगी आदित्यनाथ ने इसे ‘आदत से मजबूर’ लोगों की साजिश बताते हुए सख्त चेतावनी दी। इस हिंसा का असर यूपी के अन्य जिलों जैसे मऊ, कासगंज और रायबरेली तक फैल गया, जहां समान पोस्टर लगाने के प्रयासों से तनाव बढ़ा। विपक्षी नेता इसे ‘सोची-समझी साजिश’ बता रहे हैं, जबकि भाजपा इसे ‘उपद्रवियों का खेल’ कह रही है।

सहारनपुर में हाउस अरेस्ट: लोकतंत्र पर हमला या शांति की रक्षा?
सहारनपुर में स्थिति तब बिगड़ी जब सांसद इमरान मसूद ने बरेली डेलिगेशन का नेतृत्व करने का ऐलान किया। मंगलवार रात से ही उनके और विधायक शाहनवाज खान के आवासों पर भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया। किसी बाहरी व्यक्ति को बिना अनुमति प्रवेश की इजाजत नहीं। प्रशासन का स्पष्ट मत है कि बरेली का माहौल संवेदनशील है, और नेताओं की मौजूदगी स्थिति को और जटिल बना सकती है। एलआईयू (लोकल इंटेलिजेंस यूनिट) की रिपोर्ट के आधार पर यह कदम उठाया गया।
समर्थकों ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन बताया। सड़कों पर नारेबाजी हुई, और सोशल मीडिया पर #ReleaseImranMasood जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे। लेकिन पुलिस का कहना है कि शांति-व्यवस्था सर्वोच्च प्राथमिकता है, और हालात बिगड़ने नहीं दिए जाएंगे। इस घटना ने जिले की राजनीति को गरमा दिया है, जहां विपक्षी दल सरकार पर ‘धर्म-आधारित भेदभाव’ का आरोप लगा रहे हैं।
इमरान मसूद का बयान: दोहरी नीति पर सवाल, मुसलमानों को दी सलाह
हाउस अरेस्ट के बावजूद सांसद इमरान मसूद ने मीडिया को बाइट देकर सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा, “हम सिर्फ दो लोग ट्रेन से बरेली जा रहे थे, फिर भी हमें रोका गया। यह लोकतंत्र पर सीधा हमला है। फतेहपुर की मस्जिद और मजार पर तोड़फोड़ हुई, मुजफ्फरनगर में खुलेआम लूटपाट हुई, लेकिन वहां कार्रवाई नहीं हुई। जबकि एक पोस्टर लगाने पर पुलिस युवाओं के हाथ-पैर तोड़ देती है। एक ही देश में दो कानून चल रहे हैं – मुसलमानों के लिए अलग और दूसरों के लिए अलग।”
मसूद ने बुलडोजर कार्रवाई को भी मुस्लिम समाज को निशाना बनाने का हथियार बताया। उन्होंने युवाओं से अपील की, “ऐसे एजेंटों से दूर रहें जो आपको भड़काते हैं। अपनी ऊर्जा शिक्षा और रोजगार पर लगाएं। ‘आई लव मोहम्मद’ कहना कोई जुर्म नहीं, लेकिन सड़कों पर हंगामा करना सही नहीं। मोहम्मद मेरी जिंदगी का मकसद हैं, लेकिन मोहब्बत उनके उसूलों पर चलकर दिखानी है, न कि प्रदर्शन से। मस्जिद नमाज के लिए है, उपद्रव के लिए नहीं। मौलानाओं को आगे आकर इसे रोकना चाहिए।”
उनके इस बयान ने विपक्ष में समर्थन जुटा लिया। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने ट्वीट कर कहा, “सरकारें लाठीचार्ज से नहीं चलतीं।” वहीं, सुप्रीम कोर्ट की वकील फराह फैज ने इसे ‘चीप पब्लिसिटी’ बताते हुए उपद्रवियों पर मुकदमा दर्ज करने की मांग की। मसूद ने विवाद को 2027 चुनावों से जोड़ते हुए कहा कि नफरत का माहौल जानबूझकर बनाया जा रहा है।
राजनीतिक निहितार्थ: चुनावी सियासत में नया मोड़
यह घटना यूपी की सियासत को नया आयाम दे रही है। कांग्रेस और सपा जैसे दल इसे मुस्लिम वोट बैंक को एकजुट करने का मौका मान रहे हैं, जबकि भाजपा इसे ‘शांति भंग करने वालों’ के खिलाफ सख्ती बता रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि ‘आई लव मोहम्मद’ जैसे मुद्दे सामाजिक सद्भाव को खतरे में डालते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी ऐसे मामलों में नफरत फैलाने वालों पर सख्ती बरतने का निर्देश दिया है।
प्रशासन दोनों नेताओं पर नजर बनाए हुए है, और बरेली में तनाव कम करने के प्रयास जारी हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह विवाद शांत होगा या राजनीतिक रंग लेते हुए और फैलेगा? इमरान मसूद का यह बयान निश्चित रूप से विमर्श का केंद्र बनेगा, जो समाज में व्याप्त ध्रुवीकरण को उजागर करता है।
निष्कर्ष: बरेली हिंसा और सहारनपुर हाउस अरेस्ट की यह घटना एक बार फिर याद दिलाती है कि धार्मिक संवेदनशीलता को राजनीतिक हथियार बनाने से समाज का नुकसान ही होता है। सरकार को चाहिए कि कानून को समान रूप से लागू करे, ताकि ‘एक देश, एक कानून’ का नारा साकार हो। युवाओं को शिक्षा और विकास की राह पर लगाना ही असली समाधान है।







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