संवाददाता:जोगेंन्द्र कल्याण
ऐसे समय में जब देश में धर्म और राजनीति के नाम पर समाज को बांटने की कोशिशें हो रही हैं, सहारनपुर से हिंदू-मुस्लिम भाईचारे और इंसानियत का संदेश देने वाली एक प्रेरणादायक खबर सामने आई है। यहां का एक मुस्लिम परिवार पिछले 20 वर्षों से दशहरा पर्व के लिए रावण, मेघनाथ और कुंभकरण के विशालकाय पुतले तैयार कर रहा है, जो न केवल उत्सव को भव्य बनाता है, बल्कि गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल भी पेश करता है।

पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा
शामली-मुजफ्फरनगर का यह परिवार हर साल दशहरे के मौके पर सहारनपुर पहुंचता है। गांधी पार्क और गुरु नानक स्कूल में ठहरकर यह परिवार पूरे एक महीने तक इन पुतलों को बनाने में जुटा रहता है। परिवार के सदस्यों का कहना है, “हम अपनी रोजी-रोटी के साथ-साथ हिंदू भाइयों के पर्व में योगदान देकर गर्व और खुशी महसूस करते हैं। राजनीति और नेताओं की बातों से हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। हमारा मकसद सिर्फ इंसानियत और भाईचारे को मजबूत करना है।”

इस बार के पुतलों की खासियत
इस साल परिवार ने 100 फुट ऊंचा रावण, 80 फुट का कुंभकरण और 70 फुट का मेघनाथ का पुतला तैयार किया है। इनमें सबसे खास है रावण का पुतला, जो मुंह खोलकर हंसता है और दर्शकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनता है। इन विशालकाय पुतलों को बनाने में न केवल कारीगरी, बल्कि मेहनत और समर्पण भी झलकता है।
दशहरा उत्सव की तैयारियां
परिवार के अनुसार, दशहरा महोत्सव की तैयारियां एक महीने पहले शुरू हो जाती हैं। रावण दहन के बाद ही वे अपने घर लौटते हैं। सहारनपुर की विभिन्न समितियां उन्हें हर साल आमंत्रित करती हैं और उनके ठहरने से लेकर हर जरूरत का पूरा ध्यान रखती हैं। यह सहयोग और सम्मान इस परिवार को हर साल वापस लौटने के लिए प्रेरित करता है।
हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक
पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह परिवार रावण दहन के लिए पुतले बनाता आ रहा है। यह परंपरा न केवल दशहरा उत्सव को और भव्य बनाती है, बल्कि हिंदू-मुस्लिम एकता का एक जीवंत उदाहरण भी प्रस्तुत करती है। यह कहानी हमें सिखाती है कि धर्म और समुदाय से ऊपर उठकर इंसानियत और भाईचारा ही समाज की असली ताकत है।
सहारनपुर का यह परिवार अपनी कला और समर्पण के जरिए न केवल दशहरे के उत्सव को रंग दे रहा है, बल्कि समाज को एकता और प्रेम का संदेश भी दे रहा है।








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