देहरादून, 17 फरवरी 2026 – राजकीय दून मेडिकल कॉलेज, पटेल नगर में विश्वमांगल्य सभा के तत्वाधान में आयोजित ‘मातृ संस्कार समागम’ कार्यक्रम में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मातृशक्ति को नमन करते हुए कहा कि “संस्कारों से ही सशक्त होगा उत्तराखंड और राष्ट्र”। इस ऐतिहासिक आयोजन में प्रदेश के विभिन्न जनपदों से आईं माताओं, बहनों और नारी शक्ति का अभिनंदन किया गया। मुख्यमंत्री ने अपने बचपन के संघर्षपूर्ण जीवन और माँ द्वारा दिए गए संस्कारों को साझा करते हुए कहा कि “परिवार ही पहला विद्यालय है, जहाँ से बनता है राष्ट्र का चरित्र”।

मुख्यमंत्री का व्यक्तिगत अनुभव और संदेश
मुख्यमंत्री श्री धामी ने अपने संबोधन में कहा:
“मेरा जीवन किसी विशेष सुविधा या संसाधनों से नहीं बना, बल्कि संघर्ष, अनुशासन और संस्कारों की पूंजी से बना है। साधारण परिवार में पले-बढ़े होने के कारण मैंने प्रारंभ से ही मेहनत, ईमानदारी और आत्मनिर्भरता का महत्व समझा। सीमित संसाधनों के बीच बड़े सपने देखने और उन्हें साकार करने का संकल्प ही मेरे व्यक्तित्व की असली ताकत बना।”
उन्होंने आगे कहा:
“आधुनिकता और परंपरा का संतुलन ही विकास का सही मार्ग है। आज संयुक्त परिवारों का स्वरूप सीमित हो रहा है, एकल परिवार बढ़ रहे हैं। सुविधा और स्वतंत्रता के साथ-साथ सामूहिकता और आत्मीयता का भाव भी प्रभावित हो रहा है। व्यस्तता और प्रतिस्पर्धा के कारण परिवारों में संवाद की कमी आई है। ऐसे समय में ‘कुटुंब प्रबोधन’ की अवधारणा समय की मांग है।”
मुख्यमंत्री ने भारतीय संस्कृति के उदाहरण देते हुए कहा कि श्रीराम-माता कौशल्या, श्रीकृष्ण-माता यशोदा और छत्रपति शिवाजी-माता जीजाबाई के व्यक्तित्व निर्माण में मातृसंस्कारों की निर्णायक भूमिका रही। उन्होंने छात्रों और युवाओं से आह्वान किया कि वे अपने ज्ञान, कौशल और संवेदनशीलता का उपयोग राष्ट्र निर्माण में करें, ताकि उनके कार्यों में करुणा, मानवता और सेवा की भावना स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो।

सप्त मातृ शक्ति सम्मान – सेवा और समर्पण की मिसाल
कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ने सप्त मातृ शक्ति सम्मान से सात विशिष्ट महिलाओं को सम्मानित किया, जिन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट योगदान दिया:
- श्रीमती ममता राणा
- श्रीमती ममता रावत
- सुश्री शैला ब्रिजनाथ
- साध्वी कमलेश भारती
- श्रीमती राजरानी अग्रवाल
- श्रीमती मन्जू टम्टा
- सुश्री कविता मलासी
ये सभी महिलाएं सेवा, समर्पण और सामाजिक कार्यों की जीती-जागती मिसाल हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि मातृशक्ति में वह सामर्थ्य है, जिसके बल पर वे न केवल परिवार को सशक्त बना सकती हैं, बल्कि समाज और राष्ट्र के कल्याण में भी निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं।

श्रीमती गीता धामी का भावुक संबोधन
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए श्रीमती गीता धामी ने कहा:
“सामाजिक सेवा ही मानवीय जीवन का मूल है। जब सेवा किसी परिवार की परंपरा बन जाती है, तो उसका प्रभाव पूरे समाज की चेतना को जागृत करता है। हमारी सनातन संस्कृति में ‘सेवा परमो धर्मः’ का भाव जीवन की वास्तविक साधना है।”
उन्होंने माताओं की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा:
“माँ केवल स्नेह की प्रतिमूर्ति नहीं, बल्कि समाज निर्माण की आधारशिला है। माँ ही प्रथम संस्कारदाता होती है, जो बच्चों के मन में सेवा, त्याग और संवेदना के बीज बोती है।”
श्रीमती धामी ने कहा कि बढ़ती एकल परिवार व्यवस्था और सीमित संवाद के कारण भावनात्मक दूरी बढ़ रही है। ऐसे समय में मातृशक्ति ही घर की सांस्कृतिक धुरी बनकर रिश्तों को मजबूत करती है। उन्होंने सभी परिवारों से आग्रह किया कि वे संवाद को जीवित रखें, सेवा को दिनचर्या का हिस्सा बनाएं और बच्चों को समाज के प्रति संवेदनशील बनाएं।

कार्यक्रम का महत्व और संदेश
यह समागम न केवल मातृशक्ति का सम्मान था, बल्कि भारतीय संस्कृति में परिवार, संस्कार और सेवा की भूमिका को पुनर्जागृत करने का प्रयास भी था। मुख्यमंत्री ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष में इस प्रकार के कार्यक्रमों को विशेष महत्व बताया और कहा कि यह वैचारिक संवाद मातृशक्ति को नई ऊर्जा और आत्मविश्वास प्रदान करेगा।
कार्यक्रम में विश्वमांगल्य सभा के पदाधिकारी श्री प्रशांत हरतालकर, डॉ. वृषाली जोशी, श्रीमती पूजा माधव, श्रीमती अनुराधा यादव, विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि, प्रदेश के विभिन्न जनपदों से आई महिलाएं, जनप्रतिनिधि और गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
उत्तराखंड में संस्कारों से सशक्त समाज का निर्माण
यह आयोजन साबित करता है कि मातृशक्ति ही राष्ट्र की असली धुरी है। परिवार मजबूत होगा तो राष्ट्र मजबूत होगा।
आपको क्या लगता है – क्या मातृसंस्कार आज के युवाओं में राष्ट्रभक्ति और सेवा भाव जगा सकते हैं?
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