बरेली जनपद के ब्लॉक भुता स्थित प्राथमिक विद्यालय हरेली अलीपुर में कार्यरत अध्यापक मोहर सिंह यादव से जुड़ा है, जिनकी सड़क दुर्घटना में घायल होने के 12 दिन बाद मौत हो गई। यह हादसा उस वक्त हुआ, जब वे एसआईआर (Special Intensive Revision) ड्यूटी पूरी कर अपने गांव लौट रहे थे।
आज़ाद समाज पार्टी के जिला प्रभारी पवन सागर ने इस घटना को लेकर कहा बीएलओ कोई मशीन नहीं हैं, वे इंसान हैं। उन्हें घर-घर जाकर दस्तावेज़ जुटाने, देर रात तक फील्ड में रहने और अत्यधिक दबाव में काम करने को मजबूर किया जा रहा है। यही दबाव उन्हें मौत की ओर धकेल रहा है।

क्या हुआ था
मृतक अध्यापक मोहर सिंह यादव, निवासी ग्राम डगरोली, थाना फतेहगंज पूर्वी, 6 दिसंबर को एसआईआर का कार्य समाप्त कर बाइक से अपने पैतृक गांव लौट रहे थे। इसी दौरान फरीदपुर क्षेत्र के कंजा/जयारत के समीप एक अज्ञात वाहन ने उनकी बाइक को जोरदार टक्कर मार दी, जिससे वे गंभीर रूप से घायल हो गए।
स्थानीय लोगों की मदद से उन्हें तत्काल बरेली के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 12 दिनों तक चले इलाज के बाद 18 दिसंबर की दोपहर उनकी मौत हो गई। प्रशासनिक रिकॉर्ड में यह एक सड़क दुर्घटना है, लेकिन परिजनों के लिए यह व्यवस्था द्वारा थोपी गई ड्यूटी का परिणाम है।

राहुल यादव ने दावा किया कि मोहर सिंह पिछले कई महीनों से गहरे मानसिक तनाव में थे।
मृतक की पत्नी ज्ञानेश्वरी देवी और भांजे राहुल यादव ने दावा किया कि मोहर सिंह पिछले कई महीनों से गहरे मानसिक तनाव में थे।
22 नवंबर को उनकी माता का निधन हो गया था, जिससे वे अवसाद में चले गए थे। इसके बावजूद उन्हें न तो पर्याप्त अवकाश मिला और न ही मानसिक स्थिति को देखते हुए ड्यूटी से राहत दी गई।
परिजनों का आरोप है कि विभाग की ओर से एसआईआर का कार्य जल्द पूरा करने का लगातार दबाव बनाया जा रहा था। देर रात तक ड्यूटी से लौटना और मानसिक थकान ही उस दुर्घटना का कारण बनी, जिसने आज चार बच्चों के सिर से पिता का साया छीन लिया।
चार बच्चों के सिर से उठा साया, घर में मचा कोहराम
घटना के बाद से मृतक की पत्नी और उनके चार बच्चों का रो-रोकर बुरा हाल है। घर में मातम पसरा है और भविष्य को लेकर गहरा संकट खड़ा हो गया है। परिजनों का सवाल है कि यदि प्रशासन ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाया होता, तो शायद आज मोहर सिंह जीवित होते।








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